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Mohd Zeeshan Shaikh

Pen Name : Zeeshan Sahir
Mumbai India | 19th July, 1999
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Mohd Zeeshan Shaikh, known by his pen name Zeeshan Sahir, has completed his MBA from NMIMS University and is currently working as a Finance Analyst in a multinational company. Recognized as the Youngest Poet of Mumbai, he is known for his thought-provoking and emotionally charged poetry. His work explores a diverse range of themes, including love, philosophy, social issues, and spirituality. He has also written essays for All India Radio Akashvani and has been a part of Akashvani Mushaira.

Through his poetry, Zeeshan Sahir has established himself as a contemporary literary figure, redefining the boundaries of traditional Urdu poetry. His unique style seamlessly blends modern sensibilities with classical nuances, making his poetry both accessible and deeply impactful. He has performed at prestigious literary events both within and beyond Mumbai.

ये जो मिलने की तैयारी बहुत है..............
ये जो मिलने की तैयारी बहुत है
मोहब्बत कम, अदाकारी बहुत है

जलाने के लिए रिश्तों की बस्ती
ग़लतफ़हमी की चिंगारी बहुत है

वो मेरी जान की दुश्मन है लेकिन
मुझे वो जान से प्यारी बहुत है

तेरी आँखों पे हम ईमान लाए
ख़ुदा के पास फ़नकारी बहुत है

तुझे पाने में हैं आसानियाँ कुछ
मगर खोने में दुश्वारी बहुत है

बसर करने को सारी ज़िंदगानी
किताबों की इक अलमारी बहुत है

मुख़ालिफ़ है अगर दुनिया तो क्या है
तुम्हारी ही तरफ़दारी बहुत है

कोई परखे तेरी ग़ज़लों को साहिर
के इन ग़ज़लों में फ़नकारी बहुत है
हर पल हर दम ज़िम्मेदारी रहती है
एक ग़लती नस्लों पर भारी रहती है

राजकुमार हूँ, सब के दिल में रहता हूँ
इस दिल में इक राजकुमारी रहती है

बेटे शहरों में जा कर आबाद हुए
कुटियों में क़िस्मत की मारी रहती है

तुझ से मिल कर जाने क्यों, फिर हफ़्तों तक
तेरी ख़ुशबू मुझ पर तारी रहती है

जब से तुमने नाम पुकारा महफ़िल में
आगे पीछे दुनिया सारी रहती है
सब अजब हैं अजीब समझेंगे
दुश्मनों को हबीब समझेंगे

हो गया इश्क़ का मर्ज़ मुझ को
क्या मर्ज़ को तबीब समझेंगे

उन की तस्वीर पर्स में रख कर
उन को दिल के क़रीब समझेंगे

तुम न हो पाए गर हमारे तो
हम तुम्हें बदनसीब समझेंगे

गुफ़्तगू शायराना मत करना
लोग साहिर अदीब समझेंगे
तुम्हारे बाद सब उल्टा दिखाई देता है
के साहिलों से भी सहरा दिखाई देता है

मैं इस लिए भी बहुत ख़ुश हूँ मेरी खिड़की से
तुम्हारे घर का जो रस्ता दिखाई देता है

हुजूम उसके बज़ाहिर है इर्द-गिर्द मगर
मुझे वो शख़्स तो तन्हा दिखाई देता है

गवाही तू ने भी दी क़त्ल की हिमायत में
ज़मीर तेरा भी मैला दिखाई देता है

जिधर भी देखें बुरा ही बुरा है दुनिया में
तुम्हें जो देख लें, अच्छा दिखाई देता है

वो पहली सफ़ में जो दुश्मन की है खड़ा साहिर
मुझे वो शख़्स तो अपना दिखाई देता है
तुम्हारे हिज्र के लम्हों का ग़म उठाते हुए
मैं शेर कहने लगा, तुम को गुनगुनाते हुए

तेरे ख़याल में डूबा हुआ था मैं ऐसे
कि हाथ जल गया मेरा दिया जलाते हुए

मैं खुदकुशी के इरादे को तर्क कर आया
तो ज़िंदगी ने दुआ दी गले लगाते हुए

हसीन आँखों के उस ख़्वाब को पता ही नहीं
बिखर चुका हूँ मैं कितना उसे सजाते हुए

ख़ुद अपने क़त्ल की साज़िश मेरी बताई गई
मैं ख़ुद ही देखा गया लाश को छुपाते हुए

सुख़न के बारे में मुझ को नसीहतें मत कर
कि उम्र बीत गई हर्फ़ को सजाते हुए

फिर एक दिन यूँ ही जन्नत की सैर कर आया
मैं माँ के पाँव को सोया था जब दबाते हुए

उसी ने मेरी नज़र में गिरा दिया मुझ को
वो जिस को मैंने संभाला था लड़खड़ाते हुए
भूल बैठे हैं राह भर का सफ़र
है यूँ दिलकश तेरी नज़र का सफ़र

मुझ को करना है गर इजाज़त हो
आप के साथ उम्र भर का सफ़र

तुम को हाथों में हाथ रखना है
ख़त्म हो जाएगा भँवर का सफ़र

जुस्तजू में तेरी क्या हम ने
कितने रास्तों पे दर-बदर का सफ़र

तुम! के साहिल से ख़ौफ़ खाते हो
और हम करते हैं भँवर का सफ़र

उस तरफ़ तेरी याद रहती है
मुझ से होगा नहीं उधर का सफ़र

हम तो ख़ाना-बदोश हैं साहिर
उम्र भर करते रहे घर का सफ़र
सभी के नाज़ ख़ुशी से उठाया करता था
मैं वो शजर हूँ सभी पर जो साया करता था

उसी ने मेरा बुढ़ापे में हाथ छोड़ दिया
मैं पेट काट के जिस को पढ़ाया करता था

फिर उसको ख़ुद ही हवा लग गई ज़माने की
ज़माने भर से जिसे मैं बचाया करता था

सुना है शहर में उस्ताद बन के फिरता है
जिसे मैं उंगली पे रख कर नचाया करता था

उसे भी वक़्त ने मेरा मुरीद कर दिया है
जो कल तलक मुझे आंखें दिखाया करता था

उसी ने फिर मुझे ‘साहिर’ बना दिया एक दिन
फ़राज़-फ़ैज़ में जिस को सुनाया करता था
इस तरह दिल का हरा घाव किया जाता है
रूह पर अश्कों का छिड़काव किया जाता है

शहर-ए-जाना से थी उम्मीद गुलाबों की मगर
मैं गुज़रता हूँ तो पथराव किया जाता है

क़ाफ़िला हो जो किसी सिम्त भी जाने वाला
उसकी बस्ती में ही ठहराव किया जाता है

अपनी औक़ात से बढ़ कर जो हुआ करती है
बस उसी चीज़ का ही भाव किया जाता है

सबसे मक़बूल मेरा शेर वही होता है
उसके होंठों से अगर ‘वाओ’ किया जाता है

हमने ज़ीशान ये सीखा है नए दोस्तों से
ख़ुद में किस तरह से बदलाव किया जाता है
फूलों के बाज़ार को मरते देखा है
दिल के कारोबार को मरते देखा है

इन आँखों में कोई ख़ौफ़ नहीं है अब
इन आँखों ने यार को मरते देखा है

लाखों हैं जो प्यार पे मर मिट जाते हैं
मैंने अपने प्यार को मरते देखा है

तेरी गली से वो भी होकर गुज़रा है
मैंने जिस बीमार को मरते देखा है

आँखों में जन्नत पाने का ख़्वाब लिए
मैंने दुनियादार को मरते देखा है

यानी मुझ में भी कुछ ख़ूबी है ‘साहिर’
ख़ुद पर जो दो-चार को मरते देखा है

देख कर ख़ुद को भी होती है जो हैरानी मुझे
इतने नज़दीक से देखा गया है यानी मुझे

ऐसी मुश्किल हूँ मेरे यार जिसे शाम ओ सहर
गालियाँ देती थी चौराहों में आसानी मुझे

जब भी हालात के पड़ते हैं तमाचे मुझको
ख़ुद की सूरत भी नहीं जाती है पहचानी मुझे

एक ही बात मैं सौ बार नहीं कह सकता
आप की तरह नहीं आती है दोहरानी मुझे

बस इसी जज़्बा-ए-ईसार ने क़ुर्बान किया
और इस बार भी देनी पड़ी क़ुर्बानी मुझे

कोई लैला का कहीं ज़िक्र अगर करता है
एक ही लड़की नज़र आती है दीवानी मुझे

तिश्नगी लब पे थी फैली हुई ऐसी साहिर
प्यास को देखता रहता था मैं और पानी मुझे

हम ऐसे लोगों के ख़ासे उसूल भी नहीं थे
फ़ुज़ूल थे मगर इतने फ़ुज़ूल भी नहीं थे

जिन्हें बैठा के सर आंखों पे रक़्स करता था
वो लोग तो मेरे क़दमों की धूल भी नहीं थे

वो कह रहा था कि हम उसका इंतिख़ाब नहीं
वो कह रहा था कि हम उसकी भूल भी नहीं थे

वो मेरी राह से कांटे हटाता जा रहा था
और उसको देने मेरे पास फूल भी नहीं थे

मैं उसको जाँ से ज़्यादा अज़ीज़ था ‘साहिर’
मगर उसे मेरे तौहफ़े क़बूल भी नहीं थे