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SAPNA MOOLCHANDANI

Ajmer India | 29 Oct
teamsapnamoolchandani@gmail.com
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उसे इस वक़्त इस महफ़िल में होना चाहिए था ख़ैर..............

उसे इस वक़्त इस महफ़िल में होना चाहिए था ख़ैर
मोहब्बत में अना को दिल से खोना चाहिए था ख़ैर

नए रिश्ते बनाने थे अगर शिकवा भुला कर सब
तो दामन पर लगा वो दाग़ धोना चाहिए था ख़ैर

पढ़ा था उस की आँखों में अधूरा एक मिसरा’ जब
उसे लिख कर ग़ज़ल का बीज बोना चाहिए था ख़ैर

पता था तुम को मेरे पास खोने को नहीं है कुछ
मुझे खो देने का डर तुम को होना चाहिए था ख़ैर

मिरे क़िस्सों में सुन कर नाम उस का लोग हँसते थे
उसे इस बात पर थोड़ा तो रोना चाहिए था ख़ैर

बिछड़ते वक़्त उस की आँख में कुछ भी नहीं देखा
उसे दो पल तो पलकों को भिगोना चाहिए था ख़ैर

अगर सपनों में करना था हक़ीक़त को बयाँ तो फिर
उसे इस के लिए थोड़ा तो सोना चाहिए था ख़ैर

मैं अपने ‘इश्क़ में डूबी थी मुझ को ‘इल्म ही कब था
उसे तो बस मोहब्बत का खिलौना चाहिए था ख़ैर

मिरे दिल की तसल्ली के लिए तस्वीर भेजी है
तुम्हें इस वक़्त मेरे पास होना चाहिए था ख़ैर

नहीं ये फ़िक्र कि वो शख़्स बेवफ़ा होगा

जो मेरा हो न सका वो किसी का क्या होगा

 

ये सोच कर के त’आरुफ़ नहीं दिया अपना

ज़रूर तुम ने मिरे बारे में सुना होगा

 

ये जानते हैं कि सीने में उस के पत्थर है

मगर यक़ीन है पत्थर में दिल छुपा होगा

 

ज़बाँ पे लाता नहीं है कभी जो ज़िक्र-ए-‘इश्क़

ज़रूर ‘इश्क़ में पागल कभी रहा होगा

 

समझ रहे थे मोहब्बत का सिलसिला जिस को

ख़बर नहीं थी कि वो एक हादिसा होगा

 

ये सोच कर तुझे हम याद करते रहते हैं

तुझे भुलाने का कोई तो रास्ता होगा

जो वफ़ादार नहीं हो सकता

वो मिरा यार नहीं हो सकता

 

जो भी करता है मोहब्बत तुझ से

वो समझदार नहीं हो सकता

 

ख़ुद को दफ़्तर में ये समझाते हैं

रोज़ इतवार नहीं हो सकता

 

बे-वफ़ाओं से त’अल्लुक़ रखना

मेरा मेआ’र नहीं हो सकता

 

‘इश्क़ में होता है मुजरिम वो शख़्स

जो गिरफ़्तार नहीं हो सकता

 

‘इश्क़ में होती है दुश्वारी पर

‘इश्क़ दुश्वार नहीं हो सकता

 

दिल से होती हैं ख़ताएँ लेकिन

दिल गुनहगार नहीं हो सकता

 

‘इश्क़ भी कर न सके कोई शख़्स

इतना बेकार नहीं हो सकता

मिरी शक्ल-ओ-सूरत से मत जान मुझ को

मिरे शेर से सिर्फ़ पहचान मुझ को

 

किसी और से ‘इश्क़ करने लगा है

तो किस हक़ से कहता है तू जान मुझ को

 

कभी मुझ पे भी नज़्म कोई लिखी है

लिखी तो बता उस का ‘उन्वान मुझ को

 

तुझे फिर किसी से मोहब्बत हुई है

तिरी बातें करती हैं हैरान मुझ को

 

न कर अपने महबूब का ज़िक्र मुझ से

न कर इस तरह से परेशान मुझ को

 

तिरी मीठी बातें ज़रा सी तवज्जोह

नहीं चाहिए तेरा एहसान मुझ को

 

तुझे मैं ने उस की जगह रख दिया है

मु’आफ़ी नहीं देगा भगवान मुझ को

 

फ़क़त अपनी तकलीफ़ दिखती है तुझ को

कभी तू समझता है इंसान मुझ को

 

मोहब्बत में अब तक मरी तो नहीं हूँ

मगर अब तू ज़िंदा भी मत मान मुझ को

नहीं ये फ़िक्र कि वो शख़्स बेवफ़ा होगा

जो मेरा हो न सका वो किसी का क्या होगा

 

ये सोच कर के त’आरुफ़ नहीं दिया अपना

ज़रूर तुम ने मिरे बारे में सुना होगा

 

ये जानते हैं कि सीने में उस के पत्थर है

मगर यक़ीन है पत्थर में दिल छुपा होगा

 

ज़बाँ पे लाता नहीं है कभी जो ज़िक्र-ए-‘इश्क़

ज़रूर ‘इश्क़ में पागल कभी रहा होगा

 

समझ रहे थे मोहब्बत का सिलसिला जिस को

ख़बर नहीं थी कि वो एक हादिसा होगा

 

ये सोच कर तुझे हम याद करते रहते हैं

तुझे भुलाने का कोई तो रास्ता होगा

............اسے اس وقت اس محفل میں ہونا چاہیے تھا خیر

اسے اس وقت اس محفل میں ہونا چاہیے تھا خیر

محبت میں انا کو دل سے کھونا چاہیے تھا خیر

 

نئے رشتہ بنانے تھے اگر شکوہ بھلا کر سب

تو دامن پر لگا وہ داغ دھونا چاہیے تھا خیر

 

پڑھا تھا اس کی آنکھوں میں ادھورا ایک مصرع جب

اسے لکھ کر غزل کا بیج بونا چاہیے تھا خیر

 

پتہ تھا تم کو میرے پاس کھونے کو نہیں ہے کچھ

مجھے کھو دینے کا ڈر تم کو ہونا چاہیے تھا خیر

 

مرے قصوں میں سن کر نام اس کا لوگ ہنستے تھے

اسے اس بات پر تھوڑا تو رونا چاہیے تھا خیر

 

بچھڑتے وقت اس کی آنکھ میں کچھ بھی نہیں دیکھا

اسے دو پل تو پلکوں کو بھگونا چاہیے تھا خیر

 

اگر سپنوں میں کرنا تھا حقیقت کو بیاں تو پھر

اسے اس کے لیے تھوڑا تو سونا چاہیے تھا خیر

 

میں اپنے عشق میں ڈوبی تھی مجھ کو علم ہی کب تھا

اسے تو بس محبت کا کھلونا چاہیے تھا خیر

 

مرے دل کی تسلی کے لیے تصویر بھیجی ہے

تمہیں اس وقت میرے پاس ہونا چاہیے تھا خیر




نہیں یہ فکر کہ وہ شخص بے وفا ہوگا

جو میرا ہو نہ سکا وہ کسی کا کیا ہوگا

 

یہ سوچ کر کے تعارف نہیں دیا اپنا

ضرور تم نے مرے بارے میں سنا ہوگا

 

یہ جانتے ہیں کہ سینہ میں اس کے پتھر ہے

مگر یقین ہے پتھر میں دل چھپا ہوگا

 

زباں پہ لاتا نہیں ہے کبھی جو ذکر عشق

ضرور عشق میں پاگل کبھی رہا ہوگا

 

سمجھ رہے تھے محبت کا سلسلہ جس کو

خبر نہیں تھی کہ وہ ایک حادثہ ہوگا

 

یہ سوچ کر تجھے ہم یاد کرتے رہتے ہیں

تجھے بھلانے کا کوئی تو راستہ ہوگا





جو وفادار نہیں ہو سکتا

وہ مرا یار نہیں ہو سکتا

 

جو بھی کرتا ہے محبت تجھ سے

وہ سمجھدار نہیں ہو سکتا

 

خود کو دفتر میں یہ سمجھاتے ہیں

روز اتوار نہیں ہو سکتا

 

بے وفاؤں سے تعلق رکھنا

میرا معیار نہیں ہو سکتا

 

عشق میں ہوتا ہے مجرم وہ شخص

جو گرفتار نہیں ہو سکتا

 

عشق میں ہوتی ہے دشواری پر

عشق دشوار نہیں ہو سکتا

 

دل سے ہوتی ہیں خطائیں لیکن

دل گنہ گار نہیں ہو سکتا

 

عشق بھی کر نہ سکے کوئی شخص

اتنا بے کار نہیں ہو سکتا





مری شکل و صورت سے مت جان مجھ کو

مرے شعر سے صرف پہچان مجھ کو

 

کسی اور سے عشق کرنے لگا ہے

تو کس حق سے کہتا ہے تو جان مجھ کو

 

کبھی مجھ پہ بھی نظم کوئی لکھی ہے

لکھی تو بتا اس کا عنوان مجھ کو

 

تجھے پھر کسی سے محبت ہوئی ہے

تری باتیں کرتی ہیں حیران مجھ کو

 

نہ کر اپنے محبوب کا ذکر مجھ سے

نہ کر اس طرح سے پریشان مجھ کو

 

تری میٹھی باتیں ذرا سی توجہ

نہیں چاہیے تیرا احسان مجھ کو

 

تجھے میں نے اس کی جگہ رکھ دیا ہے

معافی نہیں دے گا بھگوان مجھ کو

 

فقط اپنی تکلیف دکھتی ہے تجھ کو

کبھی تو سمجھتا ہے انسان مجھ کو

 

محبت میں اب تک مری تو نہیں ہوں

مگر اب تو زندہ بھی مت مان مجھ کو



نہیں یہ فکر کہ وہ شخص بے وفا ہوگا

جو میرا ہو نہ سکا وہ کسی کا کیا ہوگا

 

یہ سوچ کر کے تعارف نہیں دیا اپنا

ضرور تم نے مرے بارے میں سنا ہوگا

 

یہ جانتے ہیں کہ سینہ میں اس کے پتھر ہے

مگر یقین ہے پتھر میں دل چھپا ہوگا

 

زباں پہ لاتا نہیں ہے کبھی جو ذکر عشق

ضرور عشق میں پاگل کبھی رہا ہوگا

 

سمجھ رہے تھے محبت کا سلسلہ جس کو

خبر نہیں تھی کہ وہ ایک حادثہ ہوگا

 

یہ سوچ کر تجھے ہم یاد کرتے رہتے ہیں

تجھے بھلانے کا کوئی تو راستہ ہوگا