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Tanoj Dadhich

Kota India | 02nd Nov 1992

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Tanoj Dadhich is a distinguished Hindi-Urdu poet known for his captivating performances and powerful stage presence. With over 100 shows across India, he has mesmerized audiences at premier institutions like IIT Delhi, Hansraj College, JECRC Jaipur, CDGI Indore, NIET Greater Noida, Dyal Singh College Delhi, and RTU Kota.

Hailing from Kota, Rajasthan, Tanoj’s poetic roots trace back to childhood visits to Kavi Sammelans and Mushairas with his father and grandfather. His deep connection with poetry evolved into a career marked by versatility and impact.

He is also the host of The Shayari Hour by Poetistic, where he converses with celebrated poets and supports emerging voices. A regular performer at events by Inshaad Foundation and Raabta Foundation, Tanoj is also a seasoned host, renowned for his strong communication skills and audience engagement.

With seven years of poetic excellence, Tanoj Dadhich continues to leave a lasting mark on the Hindi-Urdu poetry scene.

बात ऐसी है नहीं वो बात ही करता नहीं..............

बात ऐसी है नहीं वो बात ही करता नहीं
जब हमें होती ज़रूरत बस तभी करता नहीं


बाप बच्चों के लिए जादूगरी करता नहीं
बस मुसलसल काम करने में कमी करता नहीं

किस क़दर उस को सताया है ख़ुदा ने इश्क़ में
जो नहीं काफ़िर है फिर भी बंदगी करता नहीं


दुश्मनों से भी बहुत बद-तर है मेरा दोस्त वो
ग़लतियों पर जो मेरी मुझ को सही करता नहीं


सोचता हूँ हिज्र कैसे काटता होगा ‘तनोज’
शे’र जो कहता नहीं और मय-कशी करता नहीं



सब हुनर आते हैं उन को आशिक़ी को छोड़ कर
सब अदाएँ हैं मुकम्मल सादगी को छोड़ कर


मुस्कुरा कर दे रहा वरदान सूरज अब उसे
जिस ने जुगनू को चुना था चाँदनी को छोड़ कर

तीसरा वो लफ़्ज़ जाने कब सुनाएँगे हमें
कब कहेंगे कुछ अलग हाँ और जी को छोड़ कर

याद हों अशआ’र जिस को ये उसी के है सिपुर्द
हम मरेंगे सिर्फ़ अपनी डाइरी को छोड़ कर

राम के जीवन से सारे दुख हटा कर देख लो
कुछ नहीं तुम को मिलेगा जानकी को छोड़ कर




हो गया मौसम सुहाना शाइ’री करने लगे
खोल यादों का ख़ज़ाना शाइ’री करने लगे

इक दफ़ा उस ने कहा था कुछ लिखो मेरे लिए
मिल गया हम को बहाना शाइ’री करने लगे

तीर और तलवार तो कब के पुराने हो गए
जब लगाना था निशाना शाइ’री करने लगे

महफ़िलों में चुटकुले पढ़ने लगे कुछ लोग जब
उन सभी को कर रवाना शाइ’री करने लगे

यार पैसा तो कमाते फिर रहे हैं दोस्त सब
नाम हम को था कमाना शाइरी करने लगे





हम जैसों के जितने सपने होते हैं
सारे तुझ से मिलते-जुलते होते हैं

दूर रहें तो याद बहुत आती सब की
साथ रहें तो घर में झगड़े होते हैं

इक दिन में ही पार समुंदर नहीं होगा
अच्छे शेर भी होते होते होते हैं

बाएँ तरफ़ अब भी अलमारी ख़ाली है
दाएँ तरफ़ ही मेरे कपड़े होते हैं

होली पर भी काम नहीं आता है वो
जिस कुर्ते पर ख़ून के धब्बे होते हैं



तुम पूछते हो वो मुझे कितना अज़ीज़ है
उसने पहन रखी है जो मेरी क़मीज़ है

मैं मानता नहीं था ये खाने की चीज़ है
तुमने बना दिया तो करेला लज़ीज़ है

कैसे मुशायरे में बुलाएँ उसे मियाँ
शायर कमाल का है मगर बद-तमीज़ है

कोई गाली नहीं देता कोई ग़ुस्सा नहीं होता
तो मैं मशहूर तो होता मगर इतना नहीं होता

हम उसको घर नहीं कहते भले कितना बड़ा ही हो
जहाँ तुलसी नहीं होती जहाँ मटका नहीं होता

बुला लो सब बड़े शाइर मगर इक दो नए रखना
शगुन पूरा नहीं होता अगर सिक्का नहीं होता

ज़माना है नया अब वो मुहब्बत कर नहीं सकता
वो जिससे एक भी रुपया कभी ख़र्चा नहीं होता

तनोज इस बार तो लाओ नयापन शेर में अपने
कि बस इक नाम लिखने से कोई मक़्ता नहीं होता



सभी कहते बहुत अच्छा अगर तुम शायरी करती
ज़माना क्या ख़ुदा सुनता अगर तुम शायरी करती


तुम्हारी बात करने की अदा ने ही किया पागल
न जाने हाल क्या होता अगर तुम शायरी करती


मुनव्वर और राहत फिर तुम्हें भी तो पसंद आते
सुनाती जौन का मतला अगर तुम शायरी करती


नियम कानून भी तुमको बहुत सी छूट देते फिर
नहीं लगता कोई नुक़्ता अगर तुम शायरी करती

कभी जब मंच पे तुमको बुलाता मैं निज़ामत में
सुनाता शेर मैं अपना अगर तुम शायरी करती



सब दे रहे हैं दिल मुझे अपना निकाल के
दर-अस्ल मैंने शे’र कहे हैं कमाल के

अब आप सोच लीजिए मजबूरियाँ मेरी
हिज्र-ओ-विसाल तय करूँ सिक्का उछाल के

हर रोज़ मैं उरूज की चढ़ता हूँ सीढ़ियाँ
क़िस्से मगर सुनाऊँ हमेशा ज़वाल के

वो चाय हो या खीर हो या इश्क़ हो ‘तनोज’
लज़्ज़त बढ़ेगी और ज़ियादा उबाल के




डरता नहीं हूँ मैं किसी भी इम्तेहान से
दूँगा सभी जवाब मगर इत्मिनान से

लौट आती है सदा यूँ मेरे जिस्म से मेरी
जैसे कि लौट आई हो ख़ाली मकान से

उसने लिया गुलाब मगर कुछ नहीं कहा
निकला नहीं है तीर अभी भी कमान से

लंकेश को हराया था सीता बचाई थी
बनता था घर को लौटना पुष्पक विमान से

ख़ुद का ही आसमान है काफ़ी ‘तनोज’ को
जलता नहीं वो और किसी की उड़ान से


मुझे लगता था दुनिया में तेरे जैसा नहीं मिलता
मगर फिर याद आया ढूँढने से क्या नहीं मिलता

बिना अंजाम जाने इश्क़ का आगाज़ कर ले तू
कभी पहले परीक्षा से कोई पर्चा नहीं मिलता

ग़ज़ल मेरी मुहब्बत की वो टपरी है जहाँ पर बस
महकती चाय मिलती है कोई गुटखा नहीं मिलता

पुराने लोग अपने साथ ले जाते हैं काफ़ी कुछ
हमारे शहर की सड़कों पे अब तांगा नहीं मिलता

तुझे मैं तजरबे से सीख देता हूँ नए शाइर
शुरू में दाद मिलती है मगर पैसा नहीं मिलता

गुरु का नाम लेने में भी अब तो शर्म आती है
अँगूठा काट दे ऐसा कोई चेला नहीं मिलता

‘तनोज’ इन वाइज़ो की बात पर तुम ध्यान मत देना
कहेंगे शे’र हल्के हैं अगर चर्बा नहीं मिलता



जबसे उसने जंगल आना छोड़ दिया
हर पंछी ने आब-ओ-दाना छोड़ दिया

इक लड़के के अच्छे नम्बर की ख़ातिर
इक लड़की ने ख़ाना खाना छोड़ दिया

जबसे आप गए हो मेरे जीवन से
गाने सुनता हूँ पर, गाना छोड़ दिया

अब तो मेरे साथ चलो तुम शॉपिंग पर
अब तो पैसे कम करवाना छोड़ दिया

आज नहीं तो कल ग़लती को मानोगी
अफ़सर को चुनकर दीवाना छोड़ दिया




بات ایسی ہے نہیں وہ بات ہی کرتا نہیں

بات ایسی ہے نہیں وہ بات ہی کرتا نہیں

جب ہمیں ہوتی ضرورت بس تبھی کرتا نہیں



باپ بچوں کے لیے جادوگری کرتا نہیں

بس مسلسل کام کرنے میں کمی کرتا نہیں



کس قدر اس کو ستایا ہے خدا نے عشق میں

جو نہیں کافر ہے پھر بھی بندگی کرتا نہیں



دشمنوں سے بھی بہت بدتر ہے میرا دوست وہ

غلطیوں پر جو میری مجھ کو صحیح کرتا نہیں



سوچتا ہوں، ہجر کیسے کاٹتا ہوگا ‘تنوج’

شعر جو کہتا نہیں اور مے کشی کرتا نہیں 



سب ہنر آتے ہیں ان کو عاشقی کو چھوڑ کر
سب ادائیں ہیں مکمل سادگی کو چھوڑ کر

مسکرا کر دے رہا وردان سورج اب اسے
جس نے جگنو کو چنا تھا چاندنی کو چھوڑ کر

تیسرا وہ لفظ جانے کب سنائینگے ہمیں
کب کہیں گے کچھ الگ ہاں اور جی کو چھوڑ کر

یاد ہوں اشعار جس کو یہ اسی کے ہے سپرد
ہم مریں گے صرف اپنی ڈائری کو چھوڑ کر

رام کے جیون سے سارے دکھ ہٹا کر دیکھ لو
کچھ نہیں تم کو ملے گا جانکی کو چھوڑ کر




ہو گیا موسم سہانا شاعری کرنے لگے
کھول یادوں کا خزانا شاعری کرنے لگے

اک دفعہ اس نے کہا تھا کچھ لکھو میرے لیے
مل گیا ہم کو بہانا شاعری کرنے لگے

تیر اور تلوار تو کب کے پرانے ہو گئے
جب لگانا تھا نشانہ شاعری کرنے لگے

محفلوں میں چٹکلے پڑھنے لگے کچھ لوگ جب
ان سبھی کو کر روانہ شاعری کرنے لگے

یار پیسہ تو کماتے پھر رہے ہیں دوست سب
نام ہم کو تھا کمانا شاعری کرنے لگے





ہم جیسوں کے جتنے سپنے ہوتے ہیں
سارے تجھ سے ملتے جلتے ہوتے ہیں

دور رہیں تو یاد بہت آتی سب کی
ساتھ رہیں تو گھر میں جھگڑے ہوتے ہیں

اک دن میں ہی پار سمندر نہیں ہوگا
اچھے شعر بھی ہوتے ہوتے ہوتے ہیں


بائیں طرف اب بھی الماری خالی ہے
دائیں طرف ہی میرے کپڑے ہوتے ہیں


ہولی پر بھی کام نہیں آتا ہے وہ
جس کرتے پر خون کے دھبے ہوتے ہیں



کوئی گالی نہیں دیتا کوئی غصہ نہیں ہوتا
تو میں مشہور تو ہوتا مگر اتنا نہیں ہوتا

ہم اسکو گھر نہیں کہتے بھلے کتنا بڑا ہی ہو
جہاں تلسی نہیں ہوتی جہاں مٹکا نہیں ہوتا

بلا لو سب بڑے شاعر مگر اک دو نئے رکھنا
شگُن پورا نہیں ہوتا اگر سکہ نہیں ہوتا

زمانہ ہے نیا اب وہ محبت کر نہیں سکتا
وہ جس سے ایک بھی روپیہ کبھی خرچا نہیں ہوتا


تنوج اس بار تو لاؤ نیاپن شعر میں اپنے
کہ بس اک نام لکھنے سے کوئی مقطع نہیں ہوتا




سب دے رہے ہیں دل مجھے اپنا نکال کے
دراصل میں نے شعر کہے ہیں کمال کے


اب آپ سوچ لیجئے مجبوریاں میری
ہجر و وصال طے کروں سکہ اچھال کے

ہر روز میں عروج کی چڑھتا ہوں سیڑھیاں
قصے مگر سناؤں ہمیشہ زوال کے


وہ چائے ہو یا کھیر ہو یا عشق ہو ‘تنوج’
لذت بڑھےگی اور زیادہ ابال کے