इसी लिए हैं यहाँ वसवसे बहुत सारे
मिरी ज़बान पे हैं ज़ाइक़े बहुत सारे
बस इक सनम था मगर मसअले बहुत सारे
गुज़िश्ता दौर में थे वलवले बहुत सारे
हयात कहने लगी कुछ नहीं रहा बाक़ी
मगर क़ज़ा ने दिए ज़ाविए बहुत सारे
मैं बन गया था कोई जो मैं कभी था ही नहीं
नई क़बा ने दिए हौसले बहुत सारे
क़बा पहन के मिरे जिस्म की कोई मेरा
रफ़ीक़ लेने लगा फ़ैसले बहुत सारे
जब तक ये घर में क़ैद थी कितना सुकून था
अब साथ साथ चलती है तन्हाइयाँ मिरी
आह-ओ-फ़ुग़ाँ भी राएगाँ है उन के शोर में
दुश्मन बनी हुई है ये शहनाइयाँ मिरी
एक आफ़्ताब मतला-ए-दिल पर हुआ तुलूअ’
क़ौस-ए-क़ुज़ह में छुप गईं परछाइयाँ मिरी
पहरा हटे जो उन का तो मैं खुल के साँस लूँ
छोड़ेंगी कब अकेला ये तन्हाइयाँ मिरी
हर सुब्ह जागते हुए मैं सोचता हूँ ‘नूर’
कहती है कुछ न कुछ तो ये अंगड़ाइयाँ मिरी
मैं अंजान था जिन से ऐसे जज़्बों की पहचान हुई
‘नूर’ बना जो क़ौस-ए-क़ुज़ह तो रंगों की पहचान हुई
खोल के आँखें जब भी हक़ीक़त का मैं ने दीदार किया
मुझ को दिलासा देने वाले सपनों की पहचान हुई
मैं सारे आकाश में घूमा पँख थके तो लौट आया
जब आ कर डाली पे बैठा पेड़ों की पहचान हुई
इश्क़ में मिल के खींच रहा है देख लकीरें गालों पर
दुख और काजल के ना-जाएज़ रिश्तों की पहचान हुई
मैं ने अपने रहबर को बस याद किया और मुस्काया
मस्तों की टोली में जब भी पीरों से पहचान हुई
है जमा ख़ून रगों में कि रवाँ कुछ भी नहीं
तुम से ये किस ने कहा है कि वहाँ कुछ भी नहीं
कोई धड़कन की सी आवाज़ उठी सीने में
जब कि हाथों से टटोला तो कहाँ कुछ भी नहीं
क़ब्ल और बाद के मंज़र तो हुए हैं यकसाँ
तुझ से पहले कि तिरे बाद जहाँ कुछ भी नहीं
देख तन्हाई मुझे छोड़ गए यार सभी
मुस्कुरा दे कि सिवा तेरे यहाँ कुछ भी नहीं
फिर से बिर्हा में जला ‘नूर’ करिश्मा क्या है
कोई अंगार न आतिश न धुआँ कुछ भी नहीं
गोया लटों की डोर से बाँधा हुआ है चाँद
देखो स्याह ज़ुल्फ़ में कैसे फँसा है चाँद
पूनम के बाद देखा नहीं सात दिन उसे
मैं ने सुना है रूठ कर आधा हुआ है चाँद
पहले जमाल-ओ-नूर की बातों में गुम हुआ
फिर दाग़ दाग़ सुन के सिसकने लगा है चाँद
भोले के सर पे भी यही गुम्बद पे भी यही
तू क्यों सियासतों में उलझने लगा है चाँद
अम्माँ खड़ी है पास में थाली परोस कर
बरसों के बाद फिर मिरा मामा बना है चाँद
اسی لیے ہیں یہاں وسوسے بہت سارے
مری زبان پہ ہیں ذائقے بہت سارے
بس اک صنم تھا مگر مسئلے بہت سارے
گزشتہ دور میں تھے ولولے بہت سارے
حیات کہنے لگی کچھ نہیں رہا باقی
مگر قضا نے دئے زاویے بہت سارے
میں بن گیا تھا کوئی جو میں کبھی تھا ہی نہیں
نئی قبا نے دئے حوصلے بہت سارے
قبا پہن کے مرے جسم کی کوئی میرا
رفیق لینے لگا فیصلے بہت سارے
جب تک یہ گھر میں قید تھی کتنا سکون تھا
اب ساتھ ساتھ چلتی ہے تنہائیاں مری
آہ و فغاں بھی رائیگاں ہے ان کے شور میں
دشمن بنی ہوئی ہے یہ شہنائیاں مری
ایک آفتاب مطلع دل پر ہوا طلوع
قوس قزح میں چھپ گئیں پرچھائیاں مری
پہرا ہٹے جو ان کا تو میں کھل کے سانس لوں
چھوڑیں گی کب اکیلا یہ تنہائیاں مری
ہر صبح جاگتے ہوئے میں سوچتا ہوں نورؔ
کہتی ہے کچھ نہ کچھ تو یہ انگڑائیاں مری
میں انجان تھا جن سے ایسے جذبوں کی پہچان ہوئی
نورؔ بنا جو قوس قزح تو رنگوں کی پہچان ہوئی
کھول کے آنکھیں جب بھی حقیقت کا میں نے دیدار کیا
مجھ کو دلاسہ دینے والے سپنوں کی پہچان ہوئی
میں سارے آکاش میں گھوما پنکھ تھکے تو لوٹ آیا
جب آ کر ڈالی پہ بیٹھا پیڑوں کی پہچان ہوئی
عشق میں مل کے کھینچ رہا ہے دیکھ لکیریں گالوں پر
دکھ اور کاجل کے ناجائز رشتوں کی پہچان ہوئی
میں نے اپنے رہبر کو بس یاد کیا اور مسکایا
مستوں کی ٹولی میں جب بھی پیروں سے پہچان ہوئی
ہے جما خون رگوں میں کہ رواں کچھ بھی نہیں
تم سے یہ کس نے کہا ہے کہ وہاں کچھ بھی نہیں
کوئی دھڑکن کی سی آواز اٹھی سینے میں
جب کہ ہاتھوں سے ٹٹولا تو کہاں کچھ بھی نہیں
قبل اور بعد کے منظر تو ہوئے ہیں یکساں
تجھ سے پہلے کہ ترے بعد جہاں کچھ بھی نہیں
دیکھ تنہائی مجھے چھوڑ گئے یار سبھی
مسکرا دے کہ سوا تیرے یہاں کچھ بھی نہیں
پھر سے برہا میں جلا نورؔ کرشمہ کیا ہے
کوئی انگار نہ آتش نہ دھواں کچھ بھی نہیں
گویا لٹوں کی ڈور سے باندھا ہوا ہے چاند
دیکھو سیاہ زلف میں کیسے پھنسا ہے چاند
پونم کے بعد دیکھا نہیں سات دن اسے
میں نے سنا ہے روٹھ کر آدھا ہوا ہے چاند
پہلے جمال و نور کی باتوں میں گم ہوا
پھر داغ داغ سن کے سسکنے لگا ہے چاند
بھولے کے سر پہ بھی یہی گنبد پہ بھی یہی
تو کیوں سیاستوں میں الجھنے لگا ہے چاند
اماں کھڑی ہے پاس میں تھالی پروس کر
برسوں کے بعد پھر مرا ماما بنا ہے چاند