तिरी यादों से गर उबर जाएँ
‘ऐन मुमकिन है फिर कि मर जाएँ
या ख़ुदा रास्ता न मंज़िल है
कुछ तो बतला दे हम किधर जाएँ
तोड़ कर बंदिशें रिवाजों की
अब चलो हद से हम गुज़र जाएँ
रात आवारगी की सड़कों पर
हो गई सुब्ह अब तो घर जाएँ
‘इश्क़ वालो दो मशवरा मुझ को
ग़म के मारे हुए किधर जाएँ
जिस्म फिर बीच में न आएगा
हम अगर रूह में उतर जाएँ
तिश्नगी है मगर सुनो जाना
प्यास इतनी नहीं कि मर जाएँ
दर्द इतना है मेरी आँखों में
आइनें टूट कर बिखर जाएँ
हमारे हाथ में बच्चों ने तितलियाँ रख दीं
तो अपने हाथ की हम ने भी बर्छियाँ रख दीं
हुआ था ज़िक्र अचानक ही मौत का मुझ से
तड़प के उस ने मेरे लब पे उँगलियाँ रख दीं
रिहा किया है परिंदे को इस तरीक़े से
परों को खोल के पैरों में बेड़ियाँ रख दीं
तुम उस ग़रीब की झोली में रिज़्क़ भी रखना
कि जिस ग़रीब की गोदी में बेटियाँ रख दीं
हदों को तोड़ गया यूँ ग़रीब बंजारा
कि शाहज़ादी के हाथों में चूड़ियाँ रख दीं
जब उन के राह के काँटे हटा नहीं पाए
तो उन के पाँव के नीचे हथेलियाँ रख दीं
मेरी दु’आ है सलामत रहे क़यामत तक
वो ‘इश्क़ जिस ने लबों पर ये सिसकियाँ रख दीं
इश्क़ दिल में अगर नहीं होता
तेरी चौखट पे सर नहीं होता
तेरा होना हयात में मेरी
हो भी सकता है पर नहीं होता
तेरी यादों के साथ चलता हूँ
ये सफ़र क्या सफ़र नहीं होता
रेत का घर बना तो लें लेकिन
रेत होती है घर नहीं होता
हम-ज़बाँ है वो हम-ख़याल भी है
जाने क्यों हम-सफ़र नहीं होता
एक मुद्दत गुज़ार बैठे हैं
एक लम्हा बसर नहीं होता
हम तो ‘ग़ाफ़िल’ हैं दीन-ओ-दुनिया से
हम फ़क़ीरों का घर नहीं होता
माना कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा नहीं किया
लेकिन ज़मीर का कभी सौदा नहीं किया
रुस्वा हुए हैं ख़ुद उसे रुस्वा नहीं किया
चुप-चाप खाए ज़ख़्म तमाशा नहीं किया
सज्दे में जब झुकाया तो दिल से झुकाया सर
हम ने वफ़ा की राह में धोका नहीं किया
शायद तराश कर मुझे मूरत बनाए वो
पत्थर से ख़ुद को इस लिए शीशा नहीं किया
तोड़े हैं जाम तारे गिने बदली करवटें
आ देख तेरी याद में क्या क्या नहीं किया
डसते हैं सारे ख़्वाब जो बचपन में देखे थे
‘ग़ाफ़िल’ जवानी में जिन्हें पूरा नहीं किया
अब दिल को तुम से कोई भी शिकवा नहीं रहा
या’नी हमारे बीच का रिश्ता नहीं रहा
बचपन गुज़ारते हैं मशक़्क़त के साथ वो
जिन के सरों पे बाप का साया नहीं रहा
जब तक न उन की दीद हो कैसे ग़ज़ल कहूँ
मेरे ख़याल में कोई मिसरा’ नहीं रहा
सय्याद तेरे ज़ुल्म की अब इंतिहा हुई
ख़ाली क़फ़स बचा है परिंदा नहीं रहा
आवाज़ दे रहा है मुझे बार-बार क्यों
उस को ख़बर करो कि मैं ज़िंदा नहीं रहा
ख़ल्वत में मेरे साथ ही रहता है तू सनम
तेरे बग़ैर मैं कहीं तन्हा नहीं रहा
उल्फ़त में अपने यार की ‘ग़ाफ़िल’ हूँ इस क़दर
मेरा अब इस जहान से रिश्ता नहीं रहा
عین ممکن ہے پھر کہ مر جائیں
یا خدا راستا نہ منزل ہے
کچھ تو بتلا دے ہم کدھر جائیں
توڑ کر بندشیں رواجوں کی
اب چلو حد سے ہم گزر جائیں
رات آوارگی کی سڑکوں پر
ہو گئی صبح اب تو گھر جائیں
عشق والو دو مشورہ مجھ کو
غم کے مارے ہوئے کدھر جائیں
جسم پھر بیچ میں نہ آئے گا
ہم اگر روح میں اتر جائیں
تشنگی ہے مگر سنو جانا
پیاس اتنی نہیں کہ مر جائیں
درد اتنا ہے میری آنکھوں میں
آئنیں ٹوٹ کر بکھر جائیں
تو اپنے ہاتھ کی ہم نے بھی برچھیاں رکھ دیں
ہوا تھا ذکر اچانک ہی موت کا مجھ سے
تڑپ کے اس نے میرے لب پہ انگلیاں رکھ دیں
رہا کیا ہے پرندے کو اس طریقے سے
پروں کو کھول کے پیروں میں بیڑیاں رکھ دیں
تم اس غریب کی جھولی میں رزق بھی رکھنا
کہ جس غریب کی گودی میں بیٹیاں رکھ دیں
حدوں کو توڑ گیا یوں غریب بنجارہ
کہ شاہزادی کے ہاتھوں میں چوڑیاں رکھ دیں
جب ان کے راہ کے کانٹے ہٹا نہیں پائے
تو ان کے پاؤں کے نیچے ہتھیلیاں رکھ دیں
میری دعا ہے سلامت رہے قیامت تک
وہ عشق جس نے لبوں پر یہ سسکیاں رکھ دیں
عشق دل میں اگر نہیں ہوتا
تیری چوکھٹ پہ سر نہیں ہوتا
تیرا ہونا حیات میں میری
ہو بھی سکتا ہے پر نہیں ہوتا
تیری یادوں کے ساتھ چلتا ہوں
یہ سفر کیا سفر نہیں ہوتا
ریت کا گھر بنا تو لیں لیکن
ریت ہوتی ہے گھر نہیں ہوتا
ہم زباں ہے وہ ہم خیال بھی ہے
جانے کیوں ہم سفر نہیں ہوتا
ایک مدت گزار بیٹھے ہیں
ایک لمحہ بسر نہیں ہوتا
ہم تو غافلؔ ہیں دین و دنیا سے
ہم فقیروں کا گھر نہیں ہوتا
اب دل کو تم سے کوئی بھی شکوہ نہیں رہا
یعنی ہمارے بیچ کا رشتہ نہیں رہا
بچپن گزارتے ہیں مشقت کے ساتھ وہ
جن کے سروں پہ باپ کا سایا نہیں رہا
جب تک نہ ان کی دید ہو کیسے غزل کہوں
میرے خیال میں کوئی مصرع نہیں رہا
صیاد تیرے ظلم کی اب انتہا ہوئی
خالی قفس بچا ہے پرندہ نہیں رہا
آواز دے رہا ہے مجھے بار بار کیوں
اس کو خبر کرو کہ میں زندہ نہیں رہا
خلوت میں میرے ساتھ ہی رہتا ہے تو صنم
تیرے بغیر میں کہیں تنہا نہیں رہا
الفت میں اپنے یار کی غافلؔ ہوں اس قدر
میرا اب اس جہان سے رشتہ نہیں رہا
مانا کہ زندگی میں کچھ اچھا نہیں کیا
لیکن ضمیر کا کبھی سودا نہیں کیا
رسوا ہوئے ہیں خود اسے رسوا نہیں کیا
چپ چاپ کھائے زخم تماشہ نہیں کیا
سجدے میں جب جھکایا تو دل سے جھکایا سر
ہم نے وفا کی راہ میں دھوکا نہیں کیا
شاید تراش کر مجھے مورت بنائے وہ
پتھر سے خود کو اس لئے شیشہ نہیں کیا
توڑے ہیں جام تارے گنے بدلی کروٹیں
آ دیکھ تیری یاد میں کیا کیا نہیں کیا
ڈستے ہیں سارے خواب جو بچپن میں دیکھے تھے
غافلؔ جوانی میں جنہیں پورا نہیں کیا