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Ashutosh Mishra

Pen Name : Azal
Bihar India |
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ये दौलत रुत्बा शोहरत और ये ईमान मिट्टी है ..............

ये दौलत रुत्बा शोहरत और ये ईमान मिट्टी है

लगाया हाथ तब जाना फ़लक बे-जान मिट्टी है

 

लगी जब आग पत्तों में शजर तब रो पड़ा ग़म में

कहा फिर शाख़ ने हर शय यहाँ नादान मिट्टी है

 

लिखूँ मैं फ़लसफ़े की शाइरी या गीत उल्फ़त के

मैं शाइ’र हूँ मिरी हर नज़्म का उन्वान मिट्टी है

 

किताब-ए-हिज्र में मैं अब लिखूँगा वस्ल के क़िस्से

मोहब्बत में मिला है जो मुझे तावान मिट्टी है

 

नहीं मा’लूम हसरत से मैं मिट्टी देखता हूँ क्यों

मुझे शायद ख़बर है कुल मिरी पहचान मिट्टी है

 

दिखाता खेल है सब को ‘अज़ल’ बन कर मदारी और

तमाशा देखता है जो वो हर इंसान मिट्टी है

पाँव के छालों की क़ीमत जानता है बूढ़ा पेड़

इक मुसाफ़िर की मुसीबत जानता है बूढ़ा पेड़

 

बोझ लाशों का उठाना है उसे तो और अभी

जो किसानों की है हालत जानता है बूढ़ा पेड़

 

गर जड़ें मज़बूत हो तो आँधियों का ख़ौफ़ क्या

रखनी है मिट्टी से निस्बत जानता है बूढ़ा पेड़

 

वो बदलते मौसमों से भी कभी हारा नहीं

दुख से ही है सुख की लज़्ज़त जानता है बूढ़ा पेड़

 

देखता है जब गले कटते हुए अहबाब के

आने वाली है क़यामत जानता है बूढ़ा पेड़

 

फूँकते हम जा रहे हैं घर हमारा आप ही

पेड़ हैं धरती की दौलत जानता है बूढ़ा पेड़

आप भी उस हुस्न को अब फूल कहिए

देखिए नाज़ुक बदन सब फूल कहिए

 

लगती है क़ौस-ए-क़ुज़ह आरिज़ पे शबनम

बर्ग-ए-गुल जैसे हैं वो लब फूल कहिए

 

फूल से ही होती है तमसील उस की

रश्क करता है चमन जब फूल कहिए

 

बात मेरी आप अब भी जो न माने

तितली जब चूमे उसे तब फूल कहिए

 

रात-रानी बन वो आए ख़्वाब में फिर

महकी इन साँसों को हर शब फूल कहिए

 

हाथ में उस के ‘अज़ल’ ने दे दिया गुल

फ़ैसला करिए किसे अब फूल कहिए

............یہ دولت رتبہ شہرت اور یہ ایمان مٹی ہے

یہ دولت رتبہ شہرت اور یہ ایمان مٹی ہے

لگایا ہاتھ تب جانا فلک بے جان مٹی ہے

 

لگی جب آگ پتوں میں شجر تب رو پڑا غم میں

کہا پھر شاخ نے ہر شے یہاں نادان مٹی ہے

 

لکھوں میں فلسفے کی شاعری یا گیت الفت کے

میں شاعر ہوں مری ہر نظم کا عنوان مٹی ہے

 

کتاب ہجر میں میں اب لکھوں گا وصل کے قصے

محبت میں ملا ہے جو مجھے تاوان مٹی ہے

 

نہیں معلوم حسرت ث میں مٹی دیکھتا ہوں کیوں

مجھے شاید خبر ہے کل مری پہچان مٹی ہے

 

دکھاتا کھیل ہے سب ہمیں ازلؔ بن کر مداری اور

تماشا دیکھتا ہے جو وہ ہر انسان مٹی ہے





آپ بھی اس حسن کو اب پھول کہئے

دیکھیے نازک بدن سب پھول کہئے

 

لگتی ہے قوس قزح عارض پہ شبنم

برگ گل جیسے ہیں وہ لب پھول کہئے

 

پھول سے ہی ہوتی ہے تمثیل اس کی

رشک کرتا ہے چمن جب پھول کہئے

 

بات میری آپ اب بھی جو نہ مانے

تتلی جب چومے اسے تب پھول کہئے

 

رات رانی بن وہ آئے خواب میں پھر

مہکی ان سانسوں کو ہر شب پھول کہئے

 

ہاتھ میں اس کے ازلؔ نے دے دیا گل

فیصلہ کریے کسے اب پھول کہئے

پاؤں کے چھالوں کی قیمت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

اک مسافر کی مصیبت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

 

بوجھ لاشوں کا اٹھانا ہے اسے تو اور ابھی

جو کسانوں کی ہے حالت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

 

گر جڑیں مضبوط ہو تو آندھیوں کا خوف کیا

رکھنی ہے مٹی سے نسبت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

 

وہ بدلتے موسموں سے بھی کبھی ہارا نہیں

دکھ سے ہی ہے سکھ کی لذت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

 

دیکھتا ہے جب گلے کٹتے ہوئے احباب کے

آنے والی ہے قیامت جانتا ہے بوڑھا پیڑ

 

پھونکتے ہم جا رہے ہیں گھر ہمارا آپ ہی

پیڑ ہیں دھرتی کی دولت جانتا ہے بوڑھا پیڑ