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Salman khan

Pen Name : Salman saeed
Delhi India | 04 / 05 / 1991
Salmanbinzafar91@gmail.com
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इतनी जल्दी तो तिरे फ़न में नहीं आ सकते..............

इतनी जल्दी तो तिरे फ़न में नहीं आ सकते
हिज्र के खेल लड़कपन में नहीं आ सकते

कोई दामन हो सलामत तो चलो रो भी लूँ
मेरे आँसू किसी कतरन में नहीं आ सकते

हम से पागल को समझ पाना तिरे बस का नहीं
हम वो दरिया हैं जो बर्तन में नहीं आ सकते

हम हैं ज़ंजीरों की खन खन के बिगाड़े हुए लोग
तेरी पाज़ेब की छन-छन में नहीं आ सकते

ये मिरे ग़म तो किसी और पे जचने से रहे
ये वो कपड़े हैं जो फैशन में नहीं आ सकते

इश्क़ मज़हब को मानता ही नहीं
इश्क़ का कोई देवता ही नहीं

शर्त दुनिया से लग गई वर्ना
मैं तिरा नाम पूछता ही नहीं

उस को कुछ याद आ गया होगा
वर्ना वो फ़ोन काटता ही नहीं

मुतमइन हूँ मैं सोच कर तुझ को
तुझ से आगे मैं सोचता ही नहीं

रात दिन को बना लिया मैं ने
मैं कभी रात काटता ही नहीं

ये नया जिस्म तो ज़रूरत है
मैं नया इश्क़ चाहता ही नहीं

वो परिंदा क़फ़स में अच्छा है
पर कभी अपने खोलता ही नहीं

मोहब्बतों में किसी की हवस मिलाए हुए
मैं लौट आया हूँ ख़ालिस बदन उठाए हुए

मैं जितना चीख़ूँगा उतनी ख़मोशी फैलेगी
कई सदाएँ हैं सीने में घर बनाए हुए

तुम अपने खाने में जितना नमक मिलाते हो
मैं अपने ग़म में हूँ उतनी ख़ुशी मिलाए हुए

कमाया जाता है पैसे से जिस तरह पैसा
ये सारे ग़म हैं तिरे ग़म से ही कमाए हुए

दुखों के बोझ से फूटेगी जल्द ये गुल्लक
जगह से बढ़ के हैं सिक्के यहाँ समाए हुए

दूर मैं हो गया तुझ से कि निभाना न पड़े
इस लिए जोड़ा नहीं कुछ कि घटाना न पड़े

लोग कहते हैं मुझे इस लिए तन्हाई-पसंद
मुझ से पागल को कहीं पास बिठाना न पड़े

चाहता ये हूँ कोई बीच का रस्ता निकले
मैं तिरे साथ रहूँ उस को भुलाना न पड़े

बात तो तब है मदारी कि तमाशे में तिरे
दिल बहल जाए कोई अश्क बहाना न पड़े

उस की गलियों में वो वहशत है अगर देखे तो
तुझ को सहरा में किसी तौर भी जाना न पड़े

...........اتنی جلدی تو ترے فن میں نہیں آ سکتے

اتنی جلدی تو ترے فن میں نہیں آ سکتے

ہجر کے کھیل لڑکپن میں نہیں آ سکتے

 

کوئی دامن ہو سلامت تو چلو رو بھی لوں

میرے آنسو کسی کترن میں نہیں آ سکتے

 

ہم سے پاگل کو سمجھ پانا ترے بس کا نہیں

ہم وہ دریا ہیں جو برتن میں نہیں آ سکتے

 

ہم ہیں زنجیروں کی کھن کھن کے بگاڑے ہوئے لوگ

تیری پازیب کی چھن چھن میں نہیں آ سکتے

 

یہ مرے غم تو کسی اور پہ جچنے سے رہے

یہ وہ کپڑے ہیں جو فیشن میں نہیں آ سکتے





عشق مذہب کو مانتا ہی نہیں

عشق کا کوئی دیوتا ہی نہیں

 

شرط دنیا سے لگ گئی ورنہ

میں ترا نام پوچھتا ہی نہیں

 

اس کو کچھ یاد آ گیا ہوگا

ورنہ وہ فون کاٹتا ہی نہیں

 

مطمئن ہوں میں سوچ کر تجھ کو

تجھ سے آگے میں سوچتا ہی نہیں

 

رات دن کو بنا لیا میں نے

میں کبھی رات کاٹتا ہی نہیں

 

یہ نیا جسم تو ضرورت ہے

میں نیا عشق چاہتا ہی نہیں

 

وہ پرندہ قفس میں اچھا ہے

پر کبھی اپنے کھولتا ہی نہیں





محبتوں میں کسی کی ہوس ملائے ہوئے

میں لوٹ آیا ہوں خالص بدن اٹھائے ہوئے

 

میں جتنا چیخوں گا اتنی خموشی پھیلے گی

کئی صدائیں ہیں سینے میں گھر بنائے ہوئے

 

تم اپنے کھانے میں جتنا نمک ملاتے ہو

میں اپنے غم میں ہوں اتنی خوشی ملائے ہوئے

 

کمایا جاتا ہے پیسے سے جس طرح پیسہ

یہ سارے غم ہیں ترے غم سے ہی کمائے ہوئے

 

دکھوں کے بوجھ سے پھوٹے گی جلد یہ گلک

جگہ سے بڑھ کے ہیں سکے یہاں سمائے ہوئے





دور میں ہو گیا تجھ سے کہ نبھانا نہ پڑے

اس لیے جوڑا نہیں کچھ کہ گھٹانا نہ پڑے

 

لوگ کہتے ہیں مجھے اس لئے تنہائی پسند

مجھ سے پاگل کو کہیں پاس بٹھانا نہ پڑے

 

چاہتا یہ ہوں کوئی بیچ کا رستہ نکلے

میں ترے ساتھ رہوں اس کو بھلانا نہ پڑے

 

بات تو تب ہے مداری کہ تماشے میں ترے

دل بہل جائے کوئی اشک بہانا نہ پڑے

 

اس کی گلیوں میں وہ وحشت ہے اگر دیکھے تو

تجھ کو صحرا میں کسی طور بھی جانا نہ پڑے