पेड़ कोई नहीं जो दे पाया,
बाप के साये से घना साया।
बोझ कहना कभी न भूले से,
बेटियां तो है एक सरमाया।
इश्क में वो ही लोग ज़ाया हैं ,
जिनके हिस्से में ग़म नहीं आया।
जो कि मंज़ूर भी नहीं था कभी,
फिर उसी को क़ुबूल फरमाया।
हॅंस रहा था हर एक बात पे जो,
ख़ुश था तो क्यों नजर नहीं आया।
अपने क़द से न जो गिरा नीचे,
वो ही क़िरदार को निभा पाया ।
लाख रिश्ते हैं फिर भी तन्हा है,
साथ जिसके नहीं है हम-साया।
हमने देखा ख़ुदा भी पत्थर का,
और पत्थर में भी ख़ुदा पाया।