Search

Ashu Sharma

Pen Name : Ashu Sharma
Mumbai India | 10th October 1971

Social media links:
| |

रोज़ बुनती हूॅं टूट जाता है।..........
रोज़ बुनती हूॅं टूट जाता है।
ख़्वाब हाथों से छूट जाता है।

अश्क आंखों में जो नहीं टिकता,
वो ही आंखों को लूट जाता है।

राब्ता गर रखा नहीं जाए,
तो त’अल्लुक भी टूट जाता है।

हो महब्बत का रंग कच्चा गर,
पहली बारिश में छूट जाता है।

बेबसी उस चमन की मत पूछो,
बाग़बाऀ जिस को लूट जाता है।

ख़ून पानी से हो चुका पतला,
देख के दिल ही टूट जाता है।

तब गिला क्या करें कि जब कोई,
बन के अपना ही लूट जाता है।

बात क़िस्मत की गर नहीं होती,
ग़ैर मुमकिन था मैं तुम्हें खोती।

मार देता हमें तुम्हारा ग़म ,
इसकी शिद्दत में घर कमी होती।

बंदिशें क़ैद से भी बद्तर हैं,
इनकी मीआद भी नहीं होती।

काश इन्सां ने खुद ही इन्सां पर,
तंग ये ज़िंदगी न की होती ।

बीज ख़्वाबों के भी अगर बिकते,
नींद बंजर न फिर कोई होती।

हर ख़ुशी औरतों की क्यों गिरवी,
पास मर्दों के है रखी होती।

करके खुद को हवाले क़िस्मत के,
ज़िंदगी यह बसर नहीं होती।

ज़िक्र उसका नहीं किया मैंने।
ज़ख़्म अपना नहीं छुआ मैंने।

मुझ को दरकार ज़िंदगी कब थी,
ज़िन्दगी को मगर जिया मैंने।

तुम न करना किसी पे ऐसा कभी,
जैसा तुम पर यकीं किया मैंने।

फ़ैसला अहम जो ज़ियादा था,
सोच कर वो नहीं किया मैंने।

इश्क़ का खेल ऐसे खेला है,
जैसे खेला हो इक जुआ मैंने।

हर दफ़ा मैं सवाल करती थी,
अब कि बस फ़ैसला किया मैंने।

जो ख़ता की नहीं थी उसका भी,
सर पे इल्ज़ाम ले लिया मैंने ।

सच वो जो बदमज़ा नहीं होता,
उसका कुछ ज़ाइका नहीं होता।

कुर्बतें फ़ासले नहीं बनतीं,
जब तलक हादिसा नहीं होता।

हाथ झट से पकड़ते हैं अक्सर,
वो जिन्हें थामना नहीं होता।

इश्क़ उन के लिए है दिल जोई,
इश्क़ जिन को हुआ नहीं होता।

साथ चलने में और होने में,
फ़र्क सबको पता नहीं होता।

ऐसी आदत है दर्द की आदत,
इस से बढ़ कर नशा नहीं होता।

मेरे रास्ते में रौशनी भी नहीं।
और अजब है कि तीरग़ी भी नहीं।

ज़िंदगी दौड़ती रही हर पल,
साथ लेकिन मेरे चली भी नहीं।

एक उम्मीद मेरी मर भी गई,
लाश उसकी कहीं मिली भी नहीं।

ज़िंदगी में न जब बचे बचपन,
जो बचे फिर वो ज़िंदगी भी नहीं।

वो मेरे सामने रहा हरदम,
रू-ब-रू जिसके मैं हुई भी नहीं।

कैसे पाएगा वो ख़ुदा ख़ुद में,
कि जिसे इल्म-ए-बेख़ुदी भी नहीं।

ख़ुद को अफ़ज़ल सदा दिखाने में,
सिर्फ़ रह जाओगे फ़साने में।

नाम-ओ-शोहरत तो मिलते हैं पर दोस्त,
उम्र लग जाती है कमाने में।

आ ही जाता है याद वो अक्सर,
जिसको बरसों लगे भुलाने में।

जाने क्यों पूछते हैं हाल मेरा,
आए जिन को मज़ा सताने में।

जो मकां को ही घर समझ बैठे,
चूके रिश्तों को वो निभाने में।

ज़ुर्म यकजा तो हो सज़ा यकजा, ये मुकर्रर नहीं ज़माने में।
जब से सूरत तेरी बनी दिल में,
तब से उतरी है शाइरी दिल में।

बात बिगड़ी तो बस वही इक थी,
बात जो अनकही रही दिल में।

कोई शिकवा न ही शिक़ायत थी,
चाहतों की थी बस कमी दिल में।

टुकड़े टुकड़े वज़ूद है मेरा,
ख़ुद को हूं मैं समेटती दिल में।

ख़त्म दूरी नहीं वो हो पाती,
जो बिना बात हो बढ़ी दिल में।

इश्क़ में इक तो हार जाना था,
उस पे फिर जश्न भी मनाना था।

तैरना जानती थी मैं लेकिन,
मेरी क़िस्मत में डूब जाना था।

झट से कश्ती में चढ़ गए वो भी,
जिन को सैलाब ले के आना था।

हम से रिश्तों की बात करते थे,
जिन की फ़ितरत में छोड़ जाना था।

आरज़ू तो थी उस से मिलने की,
वक़्त का पर नहीं ठिकाना था।

वज्ह पतझड़ की बन गया आख़िर,
जिस को बन के बहार आना था।

बाज़ इन्सां को ये पत्थर का बना देती है।
सबको फ़न जीने का क़ुदरत ही सिखा देती है ।

परवरिश ग़म की अमीरों को ही बस है हासिल ,
भूख ग़म सारे गरीबों को भुला देती है ।

बढ़ के बच्चों की खुशी से तो उसे क्या होगा,
माॅं जो बच्चों पे ख़ुशी अपनी लुटा देता है।

तल्ख़ इतनी है हक़ीक़त कि न पूछे कोई,
ज़ेहन से ख्वाब के ये नक्श मिटा देती है।

वो महब्बत जो कभी चांद तलक ले जाए,
वो ही रुसवाई की दलदल में गिरा देती है।

हम क़दम हो के भी कहां साया?
धूप से जिस्स को बचा पाया ।

जिस्म पिंजरा है ख़ूबसूरत सा,
रूह को देर से समझ आया ।

लोग मर के कहां पर जाते हैं ?
कोई ज़िंदा नहीं बता पाया।

ज़िंदगी अनबुझी पहेली थी,
मौत ने आकर जिसको सुलझाया।

कोई तो बात उस जहां में है,
जो गया लौट के नहीं आया।

खेल तो उसने ही शुरू’अ किया, ख़त्म पर उस से भी न हो पाया।
पेड़ कोई नहीं जो दे पाया,
बाप के साये से घना साया।

बोझ कहना कभी न भूले से,
बेटियां तो है एक सरमाया।

इश्क में वो ही लोग ज़ाया हैं ,
जिनके हिस्से में ग़म नहीं आया।

जो कि मंज़ूर भी नहीं था कभी,
फिर उसी को क़ुबूल फरमाया।

हॅंस रहा था हर एक बात पे जो,
ख़ुश था तो क्यों नजर नहीं आया।

अपने क़द से न जो गिरा नीचे,
वो ही क़िरदार को निभा पाया ।

लाख रिश्ते हैं फिर भी तन्हा है,
साथ जिसके नहीं है हम-साया।

हमने देखा ख़ुदा भी पत्थर का,
और पत्थर में भी ख़ुदा पाया।

फ़क़त तालीम हासिल मत कराओ ।
ज़रा तहज़ीब बच्चों को सिखाओ।

दिखेंगी मंजिलें कुछ फ़ासले पर,
करो हिम्मत क़दम आगे बढ़ाओ।

कभी जो पूछ लोगे हाल मेरा,
कहूॅंगी बस कि तुम अपना सुनाओ ।

निगाहें टिक गई हैं एक बुत पर,
कहीं ज़िंदा न हो जाए, हटाओ।

सिखाया हमने खुश लिखना था तुमको,
चलो अब हम को ख़ुश रहना सिखाओ।

बात मुश्किल बड़ी थी कहानी जो,
बातों बातों में कह गए हैं वो।

साथ देता नहीं यहां कोई,
साथ सारे खड़े हैं कहने को ।

हम उन्हें लग रहे हैं बदले से,
पहले वाले नहीं रहे हैं वो ।

हमने कब इंतजार का बोला,
मुंतज़िर पर जवाब के थे वो।

ज़ख्म भरने को अब हमारे हैं,
तुम जो चाहे तो इक नया दे दो।

मैंने खोले थे जिसको दरवाज़े ,
बंद मुझ पर ही कर गया था वो ।

पास हो कर भी ऐसे तन्हा थे,
दरमियां वक़्त जैसे बैठा हो।

देखना था जिन्हें तमाशा बस,
दौड़े आए मेरी अयादत को।

खेल खेले इबादतें कह कर।
नफ़रतें की मोहब्बतें कह कर ।

साज़िशें खुल गई है तो देखो,
हॅंस पड़े हैं शरारतें कह कर ।

ख़ूब रो रो के एक हक़-गो ने,
हक़ भी मांगे तो हसरतें कह कर ।

हमने ख़ुद को तसल्ली यूॅं दी है,
आईने से ही हसरतें कह कर।

लौटते क्यों है बारहा दिल में,
वो गए हों जो हिज़रतें कह कर।

खेल खेले इबादतें कह कर।
नफ़रतें की मोहब्बतें कह कर ।

साज़िशें खुल गई है तो देखो,
हॅंस पड़े हैं शरारतें कह कर ।

ख़ूब रो रो के एक हक़-गो ने,
हक़ भी मांगे तो हसरतें कह कर ।

हमने ख़ुद को तसल्ली यूॅं दी है,
आईने से ही हसरतें कह कर।

लौटते क्यों है बारहा दिल में,
वो गए हों जो हिज़रतें कह कर।

नजरों में न था वो सो नज़ारा भी नहीं था ।
आंखों को कोई और गॅंवारा भी नहीं था।

यह बात समझने में बड़ा वक़्त लगा है,
वो ग़ैर नहीं था तो हमारा भी नहीं था।

हम दिल पे उठाए हुए फिरते रहे जिसको,
अफ़सोस के वो बोझ हमारा भी नहीं था ।

वैसे तो मुनाफ़ा भी नहीं था कोई लेकिन,
सौदे में मोहब्बत के ख़सारा भी नहीं था।

आया तो मिला ऐसे कि बिछड़ेगा नहीं अब,
और जाते हुए उसने पुकारा भी नहीं था।

मैं अपने अंधेरों में उसे ढूॅंढ रही थी,
जो मेरे मुकद्दर का सितारा भी नहीं था।

कुछ न कुछ तो जरूर बदला है।
आदमी अब डरा डरा सा है।

साफ़-गोई से है परेशानी,
चल रहा दौर साजिशों का है।

एक औरत ही आइना है वो,
जिसमें चेहरा मुआशरे का है।